मन रे.. तू काहे ना धीर धरे…

हम कितना भी इस मन को समझा लें, मगर वो समझता है क्या? ये मन कभी किसी तरह का धीरज रखता है क्या? फिर उस पर किसी और के कहने-समझाने से तो ये और भी न रुके, बल्कि और भी ज़्यादा फैलें। वैसे भी अब जबकि दुनिया ‘ये दिल मांगे मोर’ और ‘थोड़ा और विश करो’ का मंत्र लेकर बढ़ रही हैं, तब मन को बांधते की सीख देने वाले लोग गुज़रे ज़माने के लगते हैं। लेकिन ये सीख, ये समझाईश अगर रफ़ी साहब की आवाज़ में मिले तो क्या होगा? भई मैं औरों की तो नहीं जानता, लेकिन मैं तो एक जगह बैठकर अपने आप से इस मन की चंचलता पर लग़ाम कसने का वादा ज़रूर करूंगा। फिर चाहे वो वादा इस गीत के ख़त्म होने के साथ ही अपने आप टूट जाए।

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महान फिल्मकार केदार शर्मा साल 1964 में फिल्म “चित्रलेखा” लेकर आए थें, जो कि उनकी ही साल 1941 में इसी नाम से आई फिल्म की रीमेक थी। ओरिजनल फिल्म तो बेहद कामयाब रही लेकिन इसके रीमेक को न तो थिएटर में दर्शक मिलें और ना ही अख़बारों में क्रिटिक्स की तारीफ़, लिहाज़ा ये फिल्म कोई असर नहीं छोड़ पाई। जबकि फिल्म में अशोक कुमार, प्रदीप कुमार और मीना कुमारी जैसे बड़े सितारें थें। वो कहते हैं न कि सफलता का दोहराव अक़्सर ख़तरनाक होता है, तो 1964 की फिल्म “चित्रलेखा” के साथ भी यही बात लागू हुई।

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एक ख़राब फिल्म होते हुए भी “चित्रलेखा” हिंदी सिनेमा में अपनी मौजूदगी दर्ज़ करा गई और इसकी वजह बना रोशन साहब का अमर संगीत और साहिर लुधियानवी के आला दर्ज़े के गीत। ख़ासकर ‘मन रे तू काहे ना धीर धरे’ तो हमें साहिर की शब्दरचना का लोहा मानने को मजबूर कर देता है।

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उर्दू के इस महान शायर ने जिस तरह से हिंदी शब्दों का सटीक इस्तेमाल किया है वो हिंदुस्तानी ज़बान को लेकर उनकी जानकारी और समझ को ज़ाहिर करता है। (कुछ ऐसा ही एहसास मुझे तब हुआ था, जब जावेद साहब ने फिल्म “लगान” में ‘ओ पालनहारे’ और ‘राधा कैसे न जले’ लिखा था।)

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दोस्तों, रोशन और साहिर के इस प्रयास को असल में ज़िंदा किया रफ़ी साहब ने, क्योंकि उन्होंने जिस लगन, गहराई, तल्लीनता और आत्मीयता से इस गीत को गाया है, वैसे तो दोबारा से फिर कोई नहीं गा पाया है। कई साल पहले अपने एक लाइव कॉन्सर्ट के शुरू होने से पहले किशोर दा ने अपने इस दोस्त यानी रफ़ी साहब को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए ये गीत गाया था। हो सकता है कि श्रद्धांजलि के तौर पर गाए इस गीत को सुनकर लोग इन दोनों महान गायकों के बीच तुलना करने लगे, लेकिन सचमुच में ऐसा करना मुझे बहुत अखरता है क्योंकि ये दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर अपना अलग रूतबा रखते हैं। ज़रा किशोर दा की आवाज़ में ये महान गीत सुनिए…

इसी गीत को अब लता मंगेशकर जी की आवाज़ में भी सुनिए। लता जी ने भी ये गीत रफ़ी साहब को ट्रिब्यूट देने के लिए ही गाया था।

दोस्तों, हमारे हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे कई गीत हैं जो हमारे सामने जीवन का दर्शन खोलकर रख देते हैं। हो सकता है कि इनमें मेरी और आपकी पसंद के कई और भी अलग-अलग गीत शामिल हों, लेकिन ये तो मानना होगा कि फिल्म “चित्रलेखा” का ये नग़मा अपनी जगह बहुत ऊपर रखता है। बहुत-बहुत शुक़्रिया… प्यार…

शाम-ए-ग़म की क़सम.. आज ग़मगीं है हम..

 

किसी उदास शाम को जब दिल का दर्द छलक आए और आंखें इसकी गवाही देने पर उतर जाए.. तो दोस्त, किसी कोने में तन्हां होकर एक बार ये गीत ज़रूर सुनना, अजीब तसल्ली मिलेगी। वो क्या है कि जब तलत महमूद की आवाज़ लहराती हुई आस-पास हवाओं में फैलती है, तो फिर ना किसी ख़ैर-ख्वाह की ज़रूरत महसूस होती है और न अपने माशूक़ ही की कमीं मालूम पड़ती है। तलत साहब की आवाज़ सुनकर संगीत के जानकारों ने उन्हें सिल्कन वॉइस ऐसे ही तो नहीं कहा होगा। कुछ तो बात होगी जो इश्क़ में चोट खाए आशिकों ने भी उनकी आवाज़ में हम-दर्दी और दर्द की दवा दोनों ही पाई।

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थोड़ा पीछे लौटते हैं, ये वो दौर था जब दिलीप साहब धड़ाधड़ ट्रेजेडी में लिपटी हुई फिल्में दे रहे थें। परदे पर उनके निभाएं ऐसे ग़मगीं किरदारों को अपने जज़्बात ज़ाहिर करने में तलत साहब की आवाज़ ही सबसे बड़ी मददगार साबित होती थीं। अपने अभिनय से जज़्बातों को एक पूरी रफ्तार देने वाले दिलीप साहब पर तलत की नर्म लेकिन गहरी धंसने वाली आवाज़ ऐसे जंची कि वो कई बरस तक उनके लिए गाते रहे।

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निर्देशक ज़िया सरहदी की साल 1953 में रिलीज़ फिल्म “फुटपाथ” में भी जब तलत साहब ने ‘शाम-ए-ग़म की क़सम’ गाया तो लगा कि वो आवाज़ परदे पर होंठ हिला रहे दिलीप के दिल से ही निकलकर आ रही हैं। दोस्तों, इस गीत की धुन बनाई थी ख़य्याम साहब ने और लिरिक्स थें मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफ़री के।

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अगर आपने ये फिल्म देखी हो तो आपको याद ही होगा कि जब दिलीप साहब का किरदार नोशु सच्चाई के रास्ते से भटककर कालाबाज़ारियों के साथ जा मिलता है तो उसका सगा भाई और उसकी मुहब्बत माला दोनों ही उससे दूरी बना लेते हैं। ऐसे में ख़ुद को बिल्कुल अकेला पाकर नोशु अचानक माला की याद में तड़प उठता है और इसी सिचुएशन पर तलत साहब का ये गीत परदे पर नज़र आता है।

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फिल्म में माला की भूमिका में हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन यानी मीना कुमारी थीं। तो दोस्तों, अगर आपको ट्रेजेडी किंग और क्वीन दोनों की अदाकारी का मज़ा लेना है तो भी ये फिल्म देखनी तो बनती ही है।

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चलिए इसके लिरिक्स पर ग़ौर करते हैं-

शाम-ए-गम की कसम, आज ग़मगीं है हम
आ भी जा, आ भी जा आज मेरे सनम
दिल परेशान है, रात वीरान है
देख जा किस तरह आज तनहा है हम

चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं
मार डाले ना दर्द-ए-जुदाई कहीं
रुत हंसी है तो क्या, चांदनी है तो क्या
चांदनी ज़ुल्म है, और जुदाई सितम

अब तो आजा के अब रात भी सो गयी
ज़िन्दगी ग़म के सेहराओं में खो गयी
ढूँढती है नजर, तू कहा है मगर
देखते देखते आया आँखों में ग़म

ख़ासकर गीत के दूसरे अंतरे को सुनिए, जहां तलत साहब की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी उठती है जब वो कहते हैं- ‘अब तो आजा के अब रात भी सो गयी, ज़िन्दगी ग़म के सेहराओं में खो गयी…’ तो पहली लाइन को गाते हुए वो किरदार की हताशा को ज़ाहिर करते हैं और दूसरी लाइन में उसकी बेबसी को उभार देते हैं। पक्का सुनने वाला तो जैसे गायक की करामात को जानकर मंत्रमुग्ध होकर रह जाता है।

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शब्दों को इतनी गहराई से समझने और उसे अपनी गायकी में उतारने वाले सिंगर बहुत कम होते हैं और ये हमारा नसीब है कि हमें हमारी ज़बान में और हमारे फिल्म संगीत में ऐसा महान गायक मिला। चलिए आज के लिए बस इतना ही, अगली बार फिर किसी और ख़ूबसूरत गीत पर बात होगी… नमस्कार।

तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतज़ार है..

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दिल की गहराईयों से आती आवाज़ और हरदम बे-क़रारी बढ़ाने वाला इंतज़ार। फिर भी ये उम्मीद बनी है कि वो पुकारेंगे हमें.. कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर। दोस्तों शायद ही आप में से कोई साहब होंगे जिन्होंने इस गीत को सुना न हो और शिद्दत से महसूस न किया हो। क्या कमाल का गीत है ये, जिसमें गायक और संगीतकार हेमंत कुमार अपने शिखर पर नज़र आते हैं। उनकी गूंजती आवाज़ सुनकर लगता है कि जैसे कोई प्यासी रूह अपने जज़्बात बयां करने को तड़प रही हैं और तलाश रही हैं एक अपनी ही तरह की एक और रूह जो उसकी बेचैनी को समझ सकें, उसे अपना सकें।

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1969 में परदे पर आई फिल्म “ख़ामोशी” को याद रखने की कई वजहें हैं। अव्वल तो ख़ुद निर्देशक असित सेन हैं, जिनकी शख़्सियत में घुली हुई संजीदगी इस फिल्म के हर एक फ्रेम से दर्शकों पर ज़ाहिर होती हैं। दूसरी वजह है अभिनेत्री वहीदा रहमान, जिनकी ज़िंदा अदाकारी आंखें नम कर देती हैं। फिर आती है तीसरी वजह और वो है इस फिल्म का अमर संगीत।

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कभी सचिनदेव बर्मन के साथ बतौर उनके सहायक काम कर चुके हेमंत कुमार ने इस फिल्म में बतौर संगीतकार अपने गुरू के लेवल को छूआ है और दिया है एक कभी न भूलने वाला संगीत। फिर इसमें उनकी बार-बार ज़ेहन से टकराती और कानों में गूंजती आवाज़ भी तो है, जो हमारी आहत भावनाओं को सहलाती है।

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फिल्म “ख़ामोशी” को गुलज़ार साहब के गहरे मानी लिए अल्फ़ाज़ों के लिए भी जाना जाता है। तब गुलज़ार नए और मुश्क़िल लफ़्ज़ ढूंढने की बजाय शायरी के जाने-पहचाने शब्दों के साथ भी कमाल के गीत लिखा करते थें। रवायती होकर भी उनके गीत और अंदाज़ जैसे हर ओर ताज़गी फैला देता था।

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अब ज़रा इस पूरे गीत के पर ग़ौर करें-

तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है

ख़्वाब चुन रही हैं रात बे-क़रार है

होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम,

जागते रहेंगे और कितनी रात हम

मुख़्तसर सी बात है, तुमसे प्यार है

तुम्हारा इंतज़ार है…

दिल बहल तो जाएगा इस ख़याल से

हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से

रात ये क़रार की बे-क़रार है

तुम्हारा इंतज़ार है…

हम देखते हैं कि इस पूरे गीत में ‘दिल’, ‘रात’ और ‘बे-क़रार’ शब्द दो या दो से ज़्यादा बार आए हैं, लेकिन क्या कभी इसे सुनते हुए आपको ये दोहराव महसूस हुआ है? ये गाना है ही इतना नर्म और मुलायम कि शब्दों का दोहराव ज़रा भी नहीं खटकता। हालांकि गाने की जो थीम है, उसमें शब्दों का ये दोहराव ज़रूरी भी था।

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मैंने कहीं पढ़ा है कि इस फिल्म में में राजेश खन्ना को वहीदा रहमान के सुझाव पर रखा गया था। बाद में ख़ुद वहीदा जी ने ये माना था कि उस वक़्त काका इस रोल के लिए उतने मैच्योर नहीं थें, जितना कि इस रोल की डिमांड थी। वहीदा जी को आज भी लगता है कि संजीव कुमार इस रोल के लिए ज़्यादा बेहतर पसंद होते। वैसे फिल्म में धर्मेंद्र भी अपनी ख़ास भूमिका के साथ मौजूद थें और छोटे से रोल के बाद भी वो कहानी पर अपना असर छोड़ जाते हैं। ख़ैर, फिल्म “ख़ामोशी” हिंदी सिनेमा की कुछ कमाल की फिल्मों में गिनी जाती है और इसका संगीत हिंदी फिल्म म्यूज़िक की यादगार धरोहर बन चुका है। तो आप भी नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर इस गीत का एक बार फिर मज़ा उठा सकते हैं… धन्यवाद।

तुम अपना रंज-ओ-ग़म… अपनी परेशानी मुझे दे दो…

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दोस्तों, अपनी तो हसरत ही रह गई लेकिन शायद आपके पास कोई ऐसी हमकदम, कोई हमसफ़र ज़रूर होगी, जो घनी उदासी के बीच भी आपका चेहरा थामकर ये गीत गुनगुनाते हुए आपको हौसला देते रहती होगी। वो ढाल बनकर मुश्क़िल वक़्त के थपेड़ों से आपको बचाने के लिए आपके आगे आने की हिम्मत दिखाते हुए और अपनी मुहब्बत की बूंद-बूंद आप पर ख़र्च कर देती होगी। महान साहिर लुधियानवी ने औरत के समर्पण और अपने साथी के लिए उसकी फिक्र को क्या जादुई अल्फ़ाज़ दिए हैं। क्या कमाल की गहराई है हर एक शब्द में कि सुनने वालों के कानो में घुलते ही रूह तक को तसल्ली मिलती है।

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साल 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘शगुन’ को नज़ीर साहब ने डायरेक्ट किया था और इसमें अभिनय किया था कमलजीत और वहीदा रहमान ने। फिल्म का संगीत तैयार किया था हमारे और आपके ऑलटाइम फेवरेट ख़य्याम साहब ने और इस गाने में आवाज़ थी उनकी अपनी हमक़दम जगजीत कौर जी की।

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दोस्तों, परदे पर इस गीत को गाते हुए जो एक्ट्रेस दिखाई देती हैं उनके चेहरे से पल भर को भी देखने वालों की नज़रे नहीं हटती। इस ख़ूबसूरत अदाकारा का नाम है लिबी राना उर्फ निवेदिता। चेहरे पर पड़ते डिंपल और दिलकश मुस्कान वाली लिबी राना बाद के बरसों में छोटे-मोटे रोल करने लगी थीं और फिर ग़ायब ही हो गई। उफ्फ़… वो आधी रोशनी और आधी परछाई में से झांकता लिबी का चेहरा और उनकी घनी ज़ुल्फ़ों का घेरा आज भी देखने वालों पर जादू सा कर देता है।

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60 के दशक के कुछ सबसे यादगार गीतों में से एक बन चुके इस गीत का असर इतने बरसों के बाद भी बरक़रार है। रेडियो पर तो आज भी हर दूसरे या तीसरे दिन किसी श्रोता की फरमाईश पर ये गाना बज उठता है। जगजीत कौर के लिए तो ये उनका सिग्नेचर सॉन्ग माना जाता है और बाद के सालों में भी उनके चाहने वालों के दिलों में रह-रहकर इसी गीत को सुनने की चाहत जागती रही।

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हर मर्द की ख़्वाहिश अपनी औरत के मुंह से कुछ ऐसे ही अल्फ़ाज़, ऐसी ही तसल्ली और ऐसे ही हौसला देने वाली बातें सुनने की होती है। साहिर ने इंसानी जज़्बातों की इस डिमांड को ख़ूब पकड़ा और उसे इस गीत की शक़्ल दे दी। फिर ख़य्याम साहब ने भी एक बार-बार दोहराई जाने लायक धुन बना दी और बाकी का काम जगजीत कौर की दिल-ओ-दिमाग़ और रूह पर दस्तक देती आवाज़ ने कर दिया।

आइये एक नज़र इस ग़ज़ल पर डालते हैं-

तुम अपना रंजो गम, अपनी परेशानी मुझे दे दो

तुम्हें ग़म की कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों में

बुरा क्या है अगर ये दुःख ये हैरानी  मुझे दे दो ।

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे  कैसे सताती है

कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी  मुझे दे दो

वो दिल जो  मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था

बड़ी शै है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो ।

 

आपको इस ग़ज़ल का यूट्यूब लिंक भी दिए देता हूं…

 

तो आप भी लुत्फ़ उठाइयें इस बेहतरीन नग़मे का और साथ ही सलाम ठोंकते रहियें म्यूज़िक इंडस्ट्री के उन उस्तादों को जिनके गीत आज भी हमारे रंज-ओ-ग़म को राहत पहुंचाते हैं।

हमारी याद आएगी.. कभी तन्हाईयों में..

एक औरत के जज़्बात समझना हो तो कभी ये गाना सुनकर देखिए… सच कहता हूं, दिल छूने वाले अल्फ़ाज़ और रूहानी आवाज़ ऐसा क़हर ढाएंगी कि दिल का तार-तार झनझना उठेगा। अगर किसी से औरत से कभी बेवफ़ाई की हो आपने, तो फिर तो समझिए जिस्म से रूह तक कराह उठेंगी और लगेगा कि अभी जाकर माज़ी की ग़लतियां सुधार आऊं। ख़ैर, माज़ी में किसका जाना हुआ है आज तक जो आप और हम जा पाएंगे। तो चलिए क्यों न इसी गीत को सुनकर और गुनगुनाकर दिल पर उभरे बोझ को हल्का करें…

अगर आप साठ के दशक के गीतों के क़द्रदान हैं तो फिर आप फिल्म ‘हमारी याद आएगी’ के इस अमर गीत से वाक़िफ ही होंगे। अलसाई दोपहरों में अक़्सर ही विविध भारती पर ये गाना गूंजता सुनाई पड़ता है। साल 1961 में आई इस फिल्म को फिल्मकार केदार शर्मा ने बनाया था और इस गीत को लिखा भी उन्होंने ही। ये फिल्म तो नहीं चली लेकिन इसका संगीत चला और ख़ासकर ये गाना तो भारतीय फिल्म संगीत में अमर हो गया। ये गीत न केवल इसे आवाज़ देने वाली मुबारक़ बेगम का सबसे पॉपुलर नग़मा है बल्की इसे संगीत में ढालने वाले संगीतकार स्नेहल भटकर को भी इसी गाने के लिए सबसे ज़्यादा याद किया जाता है।

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Photo to Divn./April.62,A05(d) Mubarak Begum. She participated in the Music Concert held by AIR on April 28, 1962 at AIR Auditorium, New Delhi.

इस गाने से जुड़ी एक बड़ी दिलचस्प कहानी पढ़ने को मिलती है। हम सभी जानते हैं कि उस दौर में ज़्यादातर गीतों को लता मंगेशकर ही आवाज़ देती थीं। हिंदी फिल्मों के हर एक संगीतकार की पहली पसंद लताजी ही हुआ करती थीं और जब वो उपलब्ध नहीं रहती तब ही किसी दूसरी गायिका को तलाशा जाता था। स्नेहल भटकर इस फिल्म के दूसरे गानों की तरह इस गाने में भी लताजी की आवाज़ लेना चाहते थें, लेकिन उनके बेहद व्यस्त होने की वजह से ये गाना मुबारक़ बेगम के हिस्से आ गया। मुबारक़ बेगम ने इसे इतने दर्द और शिद्दत से गाया कि ये गाना फिल्म संगीत के चाहने वालों की नज़र में एक अनमोल मोती बन गया।

अफ़सोस कि अपनी ज़िंदा आवाज़ और जज़्बात से इस गाने को महान बनाने वाली मुबारक़ बेगम कोई बहुत ज़्यादा कामयाब नहीं हो पाई। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का ज़्यादातर वक़्त संघर्ष में गुज़ारा और इस क़दर प्रतिभा होने के बाद भी वो कभी स्टार सिंगर नहीं बन पाई। उस वक़्त हिंदी फिल्मों में ज़्यादातर अभिनेत्रियां लता मंगेशकर और फिर आशा भोंसले से ही आवाज़ लेना पसंद करती थीं। ज़ाहिर तौर पर ऐसे में इन दोनों को ही स्टार सिंगर्स का रूतबा मिल गया और संगीतकार भी अपने गीत लेकर इन्हीं के पास जाते थें। इंडस्ट्री के इस सिस्टम ने मुबारक़ बेगम और उन जैसी कितनी ही अलहदा आवाज़ वाली गायिकाओं का करियर चौपट कर दिया।

मुबारक़ बेगम के पुराने क़द्रदानों के मन में आज भी एक टीस रह-रहकर उठती है कि काश उन्हें और भी कुछ बेहतर गीत मिले होते तो हमारा फिल्म संगीत और भी विविधता से भरा हुआ होता। दिल को भेदने वाली ये आवाज़ और भी मीठा दर्द पैदा करती और अपने सुनने वालों में एक कसक छोड़ जाती।