शाम-ए-ग़म की क़सम.. आज ग़मगीं है हम..

 

किसी उदास शाम को जब दिल का दर्द छलक आए और आंखें इसकी गवाही देने पर उतर जाए.. तो दोस्त, किसी कोने में तन्हां होकर एक बार ये गीत ज़रूर सुनना, अजीब तसल्ली मिलेगी। वो क्या है कि जब तलत महमूद की आवाज़ लहराती हुई आस-पास हवाओं में फैलती है, तो फिर ना किसी ख़ैर-ख्वाह की ज़रूरत महसूस होती है और न अपने माशूक़ ही की कमीं मालूम पड़ती है। तलत साहब की आवाज़ सुनकर संगीत के जानकारों ने उन्हें सिल्कन वॉइस ऐसे ही तो नहीं कहा होगा। कुछ तो बात होगी जो इश्क़ में चोट खाए आशिकों ने भी उनकी आवाज़ में हम-दर्दी और दर्द की दवा दोनों ही पाई।

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थोड़ा पीछे लौटते हैं, ये वो दौर था जब दिलीप साहब धड़ाधड़ ट्रेजेडी में लिपटी हुई फिल्में दे रहे थें। परदे पर उनके निभाएं ऐसे ग़मगीं किरदारों को अपने जज़्बात ज़ाहिर करने में तलत साहब की आवाज़ ही सबसे बड़ी मददगार साबित होती थीं। अपने अभिनय से जज़्बातों को एक पूरी रफ्तार देने वाले दिलीप साहब पर तलत की नर्म लेकिन गहरी धंसने वाली आवाज़ ऐसे जंची कि वो कई बरस तक उनके लिए गाते रहे।

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निर्देशक ज़िया सरहदी की साल 1953 में रिलीज़ फिल्म “फुटपाथ” में भी जब तलत साहब ने ‘शाम-ए-ग़म की क़सम’ गाया तो लगा कि वो आवाज़ परदे पर होंठ हिला रहे दिलीप के दिल से ही निकलकर आ रही हैं। दोस्तों, इस गीत की धुन बनाई थी ख़य्याम साहब ने और लिरिक्स थें मजरूह सुल्तानपुरी और सरदार जाफ़री के।

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अगर आपने ये फिल्म देखी हो तो आपको याद ही होगा कि जब दिलीप साहब का किरदार नोशु सच्चाई के रास्ते से भटककर कालाबाज़ारियों के साथ जा मिलता है तो उसका सगा भाई और उसकी मुहब्बत माला दोनों ही उससे दूरी बना लेते हैं। ऐसे में ख़ुद को बिल्कुल अकेला पाकर नोशु अचानक माला की याद में तड़प उठता है और इसी सिचुएशन पर तलत साहब का ये गीत परदे पर नज़र आता है।

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फिल्म में माला की भूमिका में हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन यानी मीना कुमारी थीं। तो दोस्तों, अगर आपको ट्रेजेडी किंग और क्वीन दोनों की अदाकारी का मज़ा लेना है तो भी ये फिल्म देखनी तो बनती ही है।

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चलिए इसके लिरिक्स पर ग़ौर करते हैं-

शाम-ए-गम की कसम, आज ग़मगीं है हम
आ भी जा, आ भी जा आज मेरे सनम
दिल परेशान है, रात वीरान है
देख जा किस तरह आज तनहा है हम

चैन कैसा जो पहलू में तू ही नहीं
मार डाले ना दर्द-ए-जुदाई कहीं
रुत हंसी है तो क्या, चांदनी है तो क्या
चांदनी ज़ुल्म है, और जुदाई सितम

अब तो आजा के अब रात भी सो गयी
ज़िन्दगी ग़म के सेहराओं में खो गयी
ढूँढती है नजर, तू कहा है मगर
देखते देखते आया आँखों में ग़म

ख़ासकर गीत के दूसरे अंतरे को सुनिए, जहां तलत साहब की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी उठती है जब वो कहते हैं- ‘अब तो आजा के अब रात भी सो गयी, ज़िन्दगी ग़म के सेहराओं में खो गयी…’ तो पहली लाइन को गाते हुए वो किरदार की हताशा को ज़ाहिर करते हैं और दूसरी लाइन में उसकी बेबसी को उभार देते हैं। पक्का सुनने वाला तो जैसे गायक की करामात को जानकर मंत्रमुग्ध होकर रह जाता है।

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शब्दों को इतनी गहराई से समझने और उसे अपनी गायकी में उतारने वाले सिंगर बहुत कम होते हैं और ये हमारा नसीब है कि हमें हमारी ज़बान में और हमारे फिल्म संगीत में ऐसा महान गायक मिला। चलिए आज के लिए बस इतना ही, अगली बार फिर किसी और ख़ूबसूरत गीत पर बात होगी… नमस्कार।

तुम अपना रंज-ओ-ग़म… अपनी परेशानी मुझे दे दो…

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दोस्तों, अपनी तो हसरत ही रह गई लेकिन शायद आपके पास कोई ऐसी हमकदम, कोई हमसफ़र ज़रूर होगी, जो घनी उदासी के बीच भी आपका चेहरा थामकर ये गीत गुनगुनाते हुए आपको हौसला देते रहती होगी। वो ढाल बनकर मुश्क़िल वक़्त के थपेड़ों से आपको बचाने के लिए आपके आगे आने की हिम्मत दिखाते हुए और अपनी मुहब्बत की बूंद-बूंद आप पर ख़र्च कर देती होगी। महान साहिर लुधियानवी ने औरत के समर्पण और अपने साथी के लिए उसकी फिक्र को क्या जादुई अल्फ़ाज़ दिए हैं। क्या कमाल की गहराई है हर एक शब्द में कि सुनने वालों के कानो में घुलते ही रूह तक को तसल्ली मिलती है।

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साल 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘शगुन’ को नज़ीर साहब ने डायरेक्ट किया था और इसमें अभिनय किया था कमलजीत और वहीदा रहमान ने। फिल्म का संगीत तैयार किया था हमारे और आपके ऑलटाइम फेवरेट ख़य्याम साहब ने और इस गाने में आवाज़ थी उनकी अपनी हमक़दम जगजीत कौर जी की।

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दोस्तों, परदे पर इस गीत को गाते हुए जो एक्ट्रेस दिखाई देती हैं उनके चेहरे से पल भर को भी देखने वालों की नज़रे नहीं हटती। इस ख़ूबसूरत अदाकारा का नाम है लिबी राना उर्फ निवेदिता। चेहरे पर पड़ते डिंपल और दिलकश मुस्कान वाली लिबी राना बाद के बरसों में छोटे-मोटे रोल करने लगी थीं और फिर ग़ायब ही हो गई। उफ्फ़… वो आधी रोशनी और आधी परछाई में से झांकता लिबी का चेहरा और उनकी घनी ज़ुल्फ़ों का घेरा आज भी देखने वालों पर जादू सा कर देता है।

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60 के दशक के कुछ सबसे यादगार गीतों में से एक बन चुके इस गीत का असर इतने बरसों के बाद भी बरक़रार है। रेडियो पर तो आज भी हर दूसरे या तीसरे दिन किसी श्रोता की फरमाईश पर ये गाना बज उठता है। जगजीत कौर के लिए तो ये उनका सिग्नेचर सॉन्ग माना जाता है और बाद के सालों में भी उनके चाहने वालों के दिलों में रह-रहकर इसी गीत को सुनने की चाहत जागती रही।

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हर मर्द की ख़्वाहिश अपनी औरत के मुंह से कुछ ऐसे ही अल्फ़ाज़, ऐसी ही तसल्ली और ऐसे ही हौसला देने वाली बातें सुनने की होती है। साहिर ने इंसानी जज़्बातों की इस डिमांड को ख़ूब पकड़ा और उसे इस गीत की शक़्ल दे दी। फिर ख़य्याम साहब ने भी एक बार-बार दोहराई जाने लायक धुन बना दी और बाकी का काम जगजीत कौर की दिल-ओ-दिमाग़ और रूह पर दस्तक देती आवाज़ ने कर दिया।

आइये एक नज़र इस ग़ज़ल पर डालते हैं-

तुम अपना रंजो गम, अपनी परेशानी मुझे दे दो

तुम्हें ग़म की कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों में

बुरा क्या है अगर ये दुःख ये हैरानी  मुझे दे दो ।

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे  कैसे सताती है

कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी  मुझे दे दो

वो दिल जो  मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था

बड़ी शै है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो ।

 

आपको इस ग़ज़ल का यूट्यूब लिंक भी दिए देता हूं…

 

तो आप भी लुत्फ़ उठाइयें इस बेहतरीन नग़मे का और साथ ही सलाम ठोंकते रहियें म्यूज़िक इंडस्ट्री के उन उस्तादों को जिनके गीत आज भी हमारे रंज-ओ-ग़म को राहत पहुंचाते हैं।