तुम पुकार लो.. तुम्हारा इंतज़ार है..

tum pukar lo

दिल की गहराईयों से आती आवाज़ और हरदम बे-क़रारी बढ़ाने वाला इंतज़ार। फिर भी ये उम्मीद बनी है कि वो पुकारेंगे हमें.. कभी न कभी, किसी न किसी मोड़ पर। दोस्तों शायद ही आप में से कोई साहब होंगे जिन्होंने इस गीत को सुना न हो और शिद्दत से महसूस न किया हो। क्या कमाल का गीत है ये, जिसमें गायक और संगीतकार हेमंत कुमार अपने शिखर पर नज़र आते हैं। उनकी गूंजती आवाज़ सुनकर लगता है कि जैसे कोई प्यासी रूह अपने जज़्बात बयां करने को तड़प रही हैं और तलाश रही हैं एक अपनी ही तरह की एक और रूह जो उसकी बेचैनी को समझ सकें, उसे अपना सकें।

khamoshi

1969 में परदे पर आई फिल्म “ख़ामोशी” को याद रखने की कई वजहें हैं। अव्वल तो ख़ुद निर्देशक असित सेन हैं, जिनकी शख़्सियत में घुली हुई संजीदगी इस फिल्म के हर एक फ्रेम से दर्शकों पर ज़ाहिर होती हैं। दूसरी वजह है अभिनेत्री वहीदा रहमान, जिनकी ज़िंदा अदाकारी आंखें नम कर देती हैं। फिर आती है तीसरी वजह और वो है इस फिल्म का अमर संगीत।

khamoshi music

कभी सचिनदेव बर्मन के साथ बतौर उनके सहायक काम कर चुके हेमंत कुमार ने इस फिल्म में बतौर संगीतकार अपने गुरू के लेवल को छूआ है और दिया है एक कभी न भूलने वाला संगीत। फिर इसमें उनकी बार-बार ज़ेहन से टकराती और कानों में गूंजती आवाज़ भी तो है, जो हमारी आहत भावनाओं को सहलाती है।

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फिल्म “ख़ामोशी” को गुलज़ार साहब के गहरे मानी लिए अल्फ़ाज़ों के लिए भी जाना जाता है। तब गुलज़ार नए और मुश्क़िल लफ़्ज़ ढूंढने की बजाय शायरी के जाने-पहचाने शब्दों के साथ भी कमाल के गीत लिखा करते थें। रवायती होकर भी उनके गीत और अंदाज़ जैसे हर ओर ताज़गी फैला देता था।

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अब ज़रा इस पूरे गीत के पर ग़ौर करें-

तुम पुकार लो, तुम्हारा इंतज़ार है

ख़्वाब चुन रही हैं रात बे-क़रार है

होंठ पे लिए हुए दिल की बात हम,

जागते रहेंगे और कितनी रात हम

मुख़्तसर सी बात है, तुमसे प्यार है

तुम्हारा इंतज़ार है…

दिल बहल तो जाएगा इस ख़याल से

हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से

रात ये क़रार की बे-क़रार है

तुम्हारा इंतज़ार है…

हम देखते हैं कि इस पूरे गीत में ‘दिल’, ‘रात’ और ‘बे-क़रार’ शब्द दो या दो से ज़्यादा बार आए हैं, लेकिन क्या कभी इसे सुनते हुए आपको ये दोहराव महसूस हुआ है? ये गाना है ही इतना नर्म और मुलायम कि शब्दों का दोहराव ज़रा भी नहीं खटकता। हालांकि गाने की जो थीम है, उसमें शब्दों का ये दोहराव ज़रूरी भी था।

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मैंने कहीं पढ़ा है कि इस फिल्म में में राजेश खन्ना को वहीदा रहमान के सुझाव पर रखा गया था। बाद में ख़ुद वहीदा जी ने ये माना था कि उस वक़्त काका इस रोल के लिए उतने मैच्योर नहीं थें, जितना कि इस रोल की डिमांड थी। वहीदा जी को आज भी लगता है कि संजीव कुमार इस रोल के लिए ज़्यादा बेहतर पसंद होते। वैसे फिल्म में धर्मेंद्र भी अपनी ख़ास भूमिका के साथ मौजूद थें और छोटे से रोल के बाद भी वो कहानी पर अपना असर छोड़ जाते हैं। ख़ैर, फिल्म “ख़ामोशी” हिंदी सिनेमा की कुछ कमाल की फिल्मों में गिनी जाती है और इसका संगीत हिंदी फिल्म म्यूज़िक की यादगार धरोहर बन चुका है। तो आप भी नीचे दिए लिंक पर क्लिक कर इस गीत का एक बार फिर मज़ा उठा सकते हैं… धन्यवाद।

तुम अपना रंज-ओ-ग़म… अपनी परेशानी मुझे दे दो…

SHAGOON

दोस्तों, अपनी तो हसरत ही रह गई लेकिन शायद आपके पास कोई ऐसी हमकदम, कोई हमसफ़र ज़रूर होगी, जो घनी उदासी के बीच भी आपका चेहरा थामकर ये गीत गुनगुनाते हुए आपको हौसला देते रहती होगी। वो ढाल बनकर मुश्क़िल वक़्त के थपेड़ों से आपको बचाने के लिए आपके आगे आने की हिम्मत दिखाते हुए और अपनी मुहब्बत की बूंद-बूंद आप पर ख़र्च कर देती होगी। महान साहिर लुधियानवी ने औरत के समर्पण और अपने साथी के लिए उसकी फिक्र को क्या जादुई अल्फ़ाज़ दिए हैं। क्या कमाल की गहराई है हर एक शब्द में कि सुनने वालों के कानो में घुलते ही रूह तक को तसल्ली मिलती है।

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साल 1964 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘शगुन’ को नज़ीर साहब ने डायरेक्ट किया था और इसमें अभिनय किया था कमलजीत और वहीदा रहमान ने। फिल्म का संगीत तैयार किया था हमारे और आपके ऑलटाइम फेवरेट ख़य्याम साहब ने और इस गाने में आवाज़ थी उनकी अपनी हमक़दम जगजीत कौर जी की।

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दोस्तों, परदे पर इस गीत को गाते हुए जो एक्ट्रेस दिखाई देती हैं उनके चेहरे से पल भर को भी देखने वालों की नज़रे नहीं हटती। इस ख़ूबसूरत अदाकारा का नाम है लिबी राना उर्फ निवेदिता। चेहरे पर पड़ते डिंपल और दिलकश मुस्कान वाली लिबी राना बाद के बरसों में छोटे-मोटे रोल करने लगी थीं और फिर ग़ायब ही हो गई। उफ्फ़… वो आधी रोशनी और आधी परछाई में से झांकता लिबी का चेहरा और उनकी घनी ज़ुल्फ़ों का घेरा आज भी देखने वालों पर जादू सा कर देता है।

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60 के दशक के कुछ सबसे यादगार गीतों में से एक बन चुके इस गीत का असर इतने बरसों के बाद भी बरक़रार है। रेडियो पर तो आज भी हर दूसरे या तीसरे दिन किसी श्रोता की फरमाईश पर ये गाना बज उठता है। जगजीत कौर के लिए तो ये उनका सिग्नेचर सॉन्ग माना जाता है और बाद के सालों में भी उनके चाहने वालों के दिलों में रह-रहकर इसी गीत को सुनने की चाहत जागती रही।

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हर मर्द की ख़्वाहिश अपनी औरत के मुंह से कुछ ऐसे ही अल्फ़ाज़, ऐसी ही तसल्ली और ऐसे ही हौसला देने वाली बातें सुनने की होती है। साहिर ने इंसानी जज़्बातों की इस डिमांड को ख़ूब पकड़ा और उसे इस गीत की शक़्ल दे दी। फिर ख़य्याम साहब ने भी एक बार-बार दोहराई जाने लायक धुन बना दी और बाकी का काम जगजीत कौर की दिल-ओ-दिमाग़ और रूह पर दस्तक देती आवाज़ ने कर दिया।

आइये एक नज़र इस ग़ज़ल पर डालते हैं-

तुम अपना रंजो गम, अपनी परेशानी मुझे दे दो

तुम्हें ग़म की कसम इस दिल की वीरानी मुझे दे दो ।

ये माना मैं किसी काबिल नहीं हूँ इन निगाहों में

बुरा क्या है अगर ये दुःख ये हैरानी  मुझे दे दो ।

मैं देखूं तो सही दुनिया तुम्हे  कैसे सताती है

कोई दिन के लिए अपनी निगेहबानी  मुझे दे दो

वो दिल जो  मैंने माँगा था मगर गैरों ने पाया था

बड़ी शै है अगर उसकी पशेमानी मुझे दे दो ।

 

आपको इस ग़ज़ल का यूट्यूब लिंक भी दिए देता हूं…

 

तो आप भी लुत्फ़ उठाइयें इस बेहतरीन नग़मे का और साथ ही सलाम ठोंकते रहियें म्यूज़िक इंडस्ट्री के उन उस्तादों को जिनके गीत आज भी हमारे रंज-ओ-ग़म को राहत पहुंचाते हैं।